Work Rules!: Insights from Inside Google That Will Transform How You Live and Lead

इंट्रोडक्शन 

आप कैसे पता करते है कि आपके एम्पलॉईस अपने काम से खुश है? आप अपने कंपनी के रेपुटेशन को अच्छा दिखाने के लिए क्या करते हैं?जब किसी कंपनी की पीपल प्रैक्टिस और पॉलिसी ऐसे होते है जो बहुत ही बढ़िया ढंग से काम करता हो तो वैसे बिज़नेस को काफी फायदे मिलते है. उनमें से एक फायदा ये हैं कि यहां काम करने वाले काफी लोग कंपनी के लिए कमिटेड रहते है. ऐसे कमिटेड लोग कंपनी को आगे बढ़ाने और उनके टारगेट को पूरा करने में अपना बहुत कंट्रीब्यूशन देते हैं.इन अच्छे पीपल प्रैक्टिस वाले कंपनियों में गूगल कंपनी का नाम भी आता है.

अगर आप एक स्टार्ट अप के फाउंडर हैं या फिर कोई बिजनेसमैन तो आप सीख सकते है कि गूगल किस अनोखे ढंग से अपने एम्प्लाइज को हैंडल करता है. इस बुक से आप जान सकते है कि गूगल की शुरुवात बहुत ही साधारण सी थी. आपको ये भी पता चलेगा कि पूरी दुनिया के लोग गूगल को कैसे जानते है. गूगल अपने अनोखे वर्क कल्चर और अपने एम्पलॉईस का ख़याल रखने में बहुत आगे है. आप जानेंगे कि इसके लिए गूगल ने ऐसा क्या किया.अगर आप इस बुक में लिखे प्रिंसिपल्स को अपने बिज़नेस के लिए चुनते है, तो आपके एम्पलॉईस और उनके काम में आपको काफी अच्छा असर देखने को मिलेगा. आज ही इस बुक को पढ़िए और अपने एम्पलॉईस पर ध्यान देना शुरू कीजिये. अपने कंपनी के पीपल प्रैक्टिस को भी गूगल की तरह बेहतरीन बनाइये.

फाउंडर बनना 

हर कहानी की कहीं न कहीं से शुरुवात होती है. क्या आपको गूगल की शुरुवात की कहानी पता है? गूगल के दो फाउंडर्स थे, लैरी पेज और सर्गेई ब्रिन. उन्होंने ही गूगल को शुरू किया था. स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक कैंपस टूर में दोनों की मुलाकात हुई थी. हालांकि, दोनों ही अलग-अलग बैकग्राउंड के थे पर दोनों ने ही मिलकर गूगल को बनाया था. बचपन में दोनों ही मोंटेसरी स्कूल जाते थे इसलिए उनके आइडियाज भी इन्हीं मोंटेसरी स्कूल से इंस्पायर्ड था.उनका सपना सर्च इंजन बनाने के अलावा और भी बहुत कुछ करने का था. वे ये भी समझना चाहते थे कि एम्पलॉईस को कैसा बर्ताव अच्छा लगता है.

वे चाहते थे कि गूगल ऐसी जगह बने जहां काम करने का कोई मतलब हो और जहां इसके एम्पलॉईस को अपने पैशन को फॉलो करने की खुली छूट हो. साथ ही, यहां एम्पलॉईस और उनके फैमिली का हर तरीके से ख्याल रखा जाए. लेकिन, सिर्फ गूगल ही एक ऐसी कंपनी नहीं थी जो अपने एम्पलॉईस का ख्याल रखती थी, फोर्ड एंड हरशीज़ कंपनी में भी अच्छे पीपल प्रैक्टिस की जाती थी जिससे उसके एम्पलॉईस खुश रहते थे.किसी कंपनी का फाउंडर बनना सिर्फ नाम के लिए नहीं होता. फाउंडर बनना एक एटीट्यूड है, एक सोच और नज़रिया है. एक लीडर के तौर पर आपको सब के लिए ओपोर्चुनिटीज़ तैयार करनी चाहिए.

अच्छे फाउंडर्स एक दूसरे की मदद करते है और उनके आगे बढ़ाने के लिए रास्ता बनाते है. को-फाउंडर्स के साथ मिलकर अपने कंपनी के फ्यूचर को बदलने का आपके पास पावर होता है. सबसे ज़रूरी बात, सबके साथ मिलकर काम करने से ही आप अपने कंपनी को सक्सेस दिला सकते है. गूगल के एम्पलॉईस हर महीने टेक-टॉक्स होस्ट करते है जहां वे सब जमा होकर एक दूसरे से अपने काम के बारे में शेयर करते है. गूगल ने अपने एम्पलॉईस को स्टॉक्स में भी हिस्सेदारी दी है. ऐसा करने वाले कुछ ही कम्पनीज़ है जिसमें गूगल भी शामिल है. गूगल के कोशिशों के कारण ही ज़्यादा से ज़्यादा औरतें कंप्यूटर साइंस में अपना इंटरेस्ट दिखा रही हैं  और, बढ़ावा देने के लिए गूगल ने अपने एम्पलॉईस को उनके पेट यानी पालतू जानवर को भी ऑफिस लाने की इज़ाज़त दी.

कंपनी ने इसकी शुरुवात करने के लिए अपने दस एम्पलॉईस को चुना. गूगल अपने एम्पलॉईस को फ्री खाना भी देने लगे जिसकी शुरुवात उन्होंने फ्री ब्रेकफास्ट से किया. 1903 में, मिल्टन एस. हरषी ने सिर्फ हरषी कंपनी ही नहीं बल्कि पेंसिल्वेनिया में हरषी शहर की भी शुरुवात की. उन दिनों, अमेरिका में 2,500 शहर ऐसे थे जो कम्पनीज़ के थे जिनमें एक बार में, सिर्फ 3 % जनता ही रहती थी. लेकिन, मिल्टन एस. हरषी इन कंपनी-शहरों से बिलकुल अलग शहर बसाना चाहते थे जहां सड़कों के दोनों तरफ पेड़ लगे हो, सिंगल या दो फैमिली के एक साथ रहने के लिए ईंट के मकान बने हो जिनके बहुत खूबसूरत लॉन हो.

उनके शहर में सस्ते पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम बने, क्वालिटी पब्लिक स्कूल तैयार हुए और लोगों के एन्जॉयमेंट के भी इंतज़ाम किये.कुछ कम्पनीज़ के फाउंडर्स ने अपने कम्पनीज़ में बढ़िया पीपल प्रैक्टिस अपनाए क्योंकि वे अपने एम्पलॉईस को पैसे बनाने वाले रोबोट्स की तरह नहीं देखते थे. अपने एम्पलॉईस को वैल्यू देने में ही उन्हें अपने कंपनी का फायदा दिखा. एक कंपनी को सक्सेस दिलाने के लिए, उसके फाउंडर्स को अपने एम्पलॉईस को फलने -फूलने और पनपने का मौका देना चाहिए, साथ ही उनके ज़रूरतों का भी ख्याल रखना चाहिए.

कल्चर इट्स स्ट्रेटेजी को अपनाना

क्या आपने कभी गूगल की किसी ऑफिस को देखा हैं? इनके ऑफिस के फोटो को देखकर आपको ये लगेगा कि यहां मस्ती के साथ काम किया जाता है, पर मस्ती और मज़े के साथ -साथ यहाँ कल्चर पर भी बड़ा फोकस रहता है ताकि यहां के एम्पलॉईस खुश रह सके. कल्चर को गूगल कैसे अपने काम में लेता है, इसे समझने के लिए आपको मिशन, ट्रांसपेरेंसी और वॉइस के इम्पैक्ट के बारे में जानना चाहिए. आम तौर पर कम्पनीज़ का मिशन होता हैं प्रॉफिट कमाना, अपने कस्टमर्स को खुश रखना या फिर मार्केट का लीडर बनना. इस तरह के मिशन सिर्फ बिज़नेस को फायदा पहुंचाने के लिए होते है. लेकिन, गूगल का मिशन है पूरी दुनिया के इंफोर्मशन को इकठ्ठा करना, उसे ऑर्गनाइज़ करना और इस इनफार्मेशन को लोगों के लिए मुहैया करवाना. ये दिखाता है कि गूगल का गोल बिज़नेस नहीं बल्कि दुनिया के लोगों के हेल्प करने से जुड़ी है. इससे उनके एम्पलॉईस और भी बेहतर काम करने के लिए मोटिवेटेड होते है क्योंकि उन्हें अपने जॉब्स के मायने मिल जाते है. 

गूगल ने अपने सारे इनफार्मेशन आर-पार दिखने वाली एक शीशे की तरह ट्रांसपेरेंट रखा है. एक नई सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी गूगल के सारे कोड को पहले ही दिन निकाल लेता है. गूगल के ट्रांसपेरेंट होने की वजह से उसके एम्पलॉईस अपना काम और परफॉरमेंस बेहतर कर पाते हैं. किस हद तक ट्रांसपेरेंट रहना है, इसका फैसला तो कम्पनीज़ खुद लेते है पर अगर आप अपने एम्पलॉईस की कदर करते हैं तो आपको पूरी ट्रांसपेरेंसी रखनी चाहिए. खुली किताब की तरह रहने का मतलब है अपने एम्पलॉईस और उनके अच्छे जजमेंट पर भरोसा रखना.आखिरी बात, वॉइस का मतलब है कि कंपनी को चलाने में उसके एम्पलॉईस की राय , उनके ओपिनियन को सुनना. एम्पलॉईस जब अपनी राय रखते है तो कंपनियाँ अपने लिए बड़े और अच्छे डिसीज़न्स ले सकते है.

इसलिए गोल्स के बजाय कल्चर को बढ़ाने में ज़ोर देना चाहिए ताकि आपके एम्पॉलईस ईमानदारी से काम करें और कंपनी छोड़कर न जाए. हमेशा याद रखिये कि ब्रिलियंट और टैलेंटेड प्रोफेशनल वहीं काम करना पसंद करते हैं जहां उनके काम को मायने मिलते है और उनके कंट्रीब्यूशन से कंपनी को फायदा पहुँचता है.गूगल में काम करने वाले लोगों की गिनती हज़ारों में हो गई पर कंपनी मिशन पर भरोसा होने के कारण वहाँ के एम्पलॉईस एकजुट रहते और मिलकर काम करते थे.

अपने मिशन को सच बनाने का एक एग्जाम्पल जो गूगल ने बनाया था, वो था 2007 में बनाया गया गूगल स्ट्रीट. गूगल के फाउंडर लेर्री पेज ने अपने एम्प्लॉयर्स से पुछा कि  मैप में किसी भी जगह को ऊपर से देखने के बजाय , क्यों न ऐसे मैप बनाए जिसमें कोई भी जगह वैसी दिखेगी जैसे हकीकत में दिखती हैं. अब, गूगल स्ट्रीट व्यू की मदद से दुनिया के करोड़ों लोग इंटरनेट एक्सेस करते हुए हर इंटरस्टिंग जगह को खुद देख सकते है. एग्जाम्पल के लिए , आप घर बैठे ही पेरिस के आर्क दे ट्रायंफ की खूबसूरती , माउंट एवेरेस्ट के बेस कैंप का नज़ारा, गैलापागोस आइलैंड के  सी-एनिमल्स को देख सकते है. आप देख सकते है कि कैसे कोई शहर या समुदाय फैलता है और धीरे-धीरे सब बदल जाता है. गूगल स्ट्रीट व्यू की मदद से गवर्नमेंट ये तय करती है कि कौन सी जगह किसी काम के लिए सेफ है और उनको अपने रिसोर्सेज को कहाँ-कहाँ लगाना चाहिए. गूगल के इस प्रोजेक्ट ने काफी लोगों की मदद की है. इसके अलावा, गूगल स्ट्रीट की वजह से गूगल के एम्पलॉईस भी अपने कंपनी के साथ और भी ज़्यादा इन्वॉल्व हो गए. कैसे? इस कदम ने  गूगलर्स को बढ़िया काम करने को प्रेरणा दी और काम के साथ दूसरों की हेल्प करने का भी मौका दिया.

लेक वोबेगोन, वो ख़याली जगह जहां सब नए काम करने वाले एवरेज से बढ़कर थे.

आप ये कैसे पक्का करेंगे कि आपके एम्पलॉईस अपना काम सही ढंग से कर रहे हैं. क्या आप किसी भी जॉब के लिए सबसे बेहतर कैंडिडेट को हायर करते हैं? या आप एवरेज लोगों को हायर करके उन्हें बेस्ट बनाने की ट्रेनिंग देते हैं? आपको अपने कंपनी की हायरिंग और ट्रेनिंग प्रोसेस को रिव्यु करना चाहिए, इसके तीन कारण हैं. पहला हैं, अपने एम्प्लॉईस को एक अच्छा ट्रेनिंग देने में कुछ ही कम्पनीज़ सक्सेसफुल होते हैं. दूसरा, अगर कोई कंपनी की रिक्रूटिंग प्रोसेस अच्छी हैं तो शायद उनका प्रोसेस अलग और स्पेशल हैं जिसकी वजह से वे बेस्ट में भी बेस्ट चुन पाते हैं. थर्ड, नए कैंडिडेट्स को इंटरव्यू करने वाले लोग आम तौर पर इंटरव्यू लेने में अच्छे नहीं होते. कम्पनीज़ के कुछ रेप्रेसेंटेटिव्स तो बायस्ड भी ही होते हैं.सिर्फ ट्रेनिंग देना ही एक एम्प्लोयी को बेहतरीन नहीं बना सकती क्योकिं एक असरदार ट्रेनिंग प्रोग्राम बनाना नामुमकिन हैं. कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि 90 परसेंट बार, कोई भी ट्रेनिंग एक एम्प्लॉई को लम्बे समय के लिए बेहतर नहीं बना सकती. इसलिए, क्वालिटी परफॉरमेंस पाने के लिए कम्पनीज़ जो ट्रेनिंग देते हैं, वो पैसों की बर्बादी ही हैं.

एक बात जिस पर ज़्यादा ज़ोर नहीं देते हैं , वो हैं रिक्रूटमेंट को इम्पोर्टेन्ट मानना. कम्पनीज़ को ख़ास टैलेंट वाले लोगों को हायर करने में ज़्यादा पैसे लगाने चाहिए. लेकिन, ये याद रखना चाहिए कि आपको बेहतरीन एम्प्लॉईस हायर करने में टाइम लगेगा. एक और तरीका हैं जिससे आप अच्छे लोग हायर कर सकते हैं. जब भी आप किसी ऐसे शख्स से मिलें जो आपसे किसी न किसी मामले में बेहतर हो, उसे हायर कर लीजिये. इसके अलावा, आपके मैनेजर्स भी ऐसे हो जो उन लोगों को आगे आने का मौका दे जो उनसे बेहतर हो. मैनेजर्स को हमेशा अंबायस्ड रहना चाहिए. कंपनी में कौन हायर होंगे, ये फ़ैसले सिर्फ इन मैनेजर्स के नहीं होने चाहिए.अब एक एग्जाम्पल देखते हैं जहां आप ऐसे शख्स को हायर कर सकते हैं जो आपसे बेहतर हैं.लाज़लो बॉक इस बुक के ऑथर हैं और गूगल के पीपल ऑपरेशन्स के सीनियर वाईस प्रेसिडेंट भी. जब भी हायरिंग की जाती हैं, वे ऐसे कैंडिडेट को हायर करते हैं जो उनसे किसी न किसी मामले में बेहतर हैं.

गूगल के डाइवर्सिटी एंड युथ एजुकेशन प्रोग्राम्स के लीडर हैं नैंसी ली. मिस्टर बॉक ने नैंसी ली को हायर इसलिए किया क्योंकि नैंसी बहुत साफ़ और क्लियर नजरिया रखती थी और वो निडर भी थी. ये बातें बॉक को अच्छी लगी थी.  केरन मे पीपल डेवलपमेंट की वाईस प्रेसिडेंट थी और बॉक ने इन्हें इसलिए हायर किया था क्योकिं उनका इमोशनल इंटेलिजेंस बॉक से ज़्यादा था और वो एक समझदार काउंसलर थी. इस कंपनी के एम्प्लॉई सुनील चंद्र स्टाफिंग एंड पीपल सर्विसेस के वाईस प्रेसिडेंट हैं और इन्हें हायर इसलिए किया गया क्योंकि बॉक को लगा कि सुनील उनसे ज़्यादा डिसिप्लिंड और गहरी सोच वाले शख्स थे.

सुनील किसी भी प्रोसेस को यूज़र्स के लिए सस्ती, अच्छी और फ़ास्ट बना देते थे.लाज़लो ये भी नोट करते थे कि नैंसी, केरन, सुनील और दूसरे टीम मेंबर्स से वे रोज़ क्या सीख सकते हैं. बॉक ने इन सबको हायर करने के लिए काफी टाइम लगाया. खास टैलेंट वाले कैंडिडेट को हायर करने के प्रोसेस में काफी टाइम लग जाता हैं. जो भी कैंडिडेट्स आते हैं, उनमें से सिर्फ 10 परसेंट ही टॉप परफ़ॉर्मर होते हैं. इसलिए इन्हें चुनने के लिए बहुत सारे स्क्रीनिंग प्रोसेस और इंटरव्यू होने चाहिए. इन फैक्ट, किसी भी इंडस्ट्री के जो भी टॉप परफॉर्मर्स होते हैं वो दूसरा जॉब नहीं ढूंढ़ते हैं, वे तो जहां काम करते हैं वहीं अपने सक्सेस को एन्जॉय करते हैं. कोई भी एक्सेप्शनल और ख़ास टैलेंट को हायर करने में टाइम लग जाता हैं पर उन जैसों के लिए वेट करना तो बनता हैं.

अपने अंदाज़े पर भरोसा मत कीजिये.

क्या आप इस दावे पर यकीन रखते हैं कि एक इंटरव्यू के शुरू के दस सेकंड्स में ही पता चल जाता हैं कि कैंडिडेट को हायर किया जाएगा या नहीं? अगर एक इंटरव्यू लेने वाला आपको शुरू में ही पसंद कर लेता हैं तो उसे आपकी और भी कई सारी बातें पसंद आ जाते हैं. उसी तरह, अगर इंटरव्यू लेने वाला आपको नापसंद कर लेता हैं तो वो आपको रिजेक्ट करने के लिए बहाने ढूंढेगा.एक कैंडिडेट को सही तरीके से जांचने के बजाय ज़्यादातर इंटरव्यू लेने वाले शुरू में ही अपना एकतरफा मन बना लेते हैं जिसे कन्फर्मेशन बायस (confirmation bias) कहते हैं. हर किसी की अपनी खुद की सोच और धारणा होती हैं, जब एक इंटरव्यूवर इन्हीं सोच के आधार पर कैंडिडेट पर अपनी राय बना लेता हैं, बिना उसे पूरा मौका दिए, यही कन्फर्मेशन बायस हैं. हालांकि, काफी सारे तरीके हैं जिससे एक इंटरव्यू लेने वाले और एक कंपनी ओनर्स के कन्फर्मेशन बायस से बचा जा सकता हैं.पहला, कैंडिडेट के क्वालिटी के स्टैंडर्ड को बढाइये. एक कैंडिडेट में आप क्या क्वालिटीज़ ढूंढ रहे हैं, उसके बारे में अपनी सोच क्लियर रखें. हायर करने की स्पीड को बढ़ाने के लिए कैंडिडेट के क्वालिटी पर कोई समझौता मत कीजिये. 

दूसरा, करियर साइट्स और प्रोफेशनल लिंक द्वारा खुद ही कैंडिडेट्स ढूंढिए.तीसरा, बिना कोई पक्ष लिए, बिना किसी के साइड लिए कैंडिडेट्स को टेस्ट कीजिये.कैंडिडेट्स को अस्सेस और टेस्ट करने के बहुत सारे टेक्निक्स हैं. आप इन कैंडिडेट्स को उनके किए हुए काम का सैंपल मांगिये, उनके कोग्निटिव टेस्ट्स लीजिये  और फॉर्मल- इनफॉर्मल इंटरव्यू लीजिये. स्टडीज़ से ये पता चला हैं कि एक ही तरीके के अस्सेस्मेंट करने के बजाय बहुत सारे अस्सेस्मेंट्स को मिलाकर कैंडिडेट्स का टेस्ट लेना बेहतर होता हैं. आखिर में, इन कैंडिडेट्स को आपके कंपनी ज्वाइन करने की वजह दीजिये. आप यही चाहेंगे कि आपके कंपनी के साथ उनका पहला एक्सपीरियंस बहुत यादगार रहे.  गूगल से रिजेक्ट हुए 80 परसेंट लोग अपने दोस्तों को गूगल में जॉब के लिए अप्लाई करने के लिए कहते हैं.

फीडबैक देना भी बहुत ज़रूरी हैं इसलिए गूगल में,  इंटरव्यूवर कैंडिडेट के जवाबों को लिख लेते हैं ताकि वे अच्छे कैंडिडेट्स की पहचान कर सके. वैसे, गूगल में इंटरव्यू लेने वालों में सिर्फ मैनेजर्स और एक्सेक्यूटिव्स नहीं होते हैं. टीम के पुराने एम्पलॉईस भी कैंडिडेट्स का अस्सेस्मेंट लेते हैं. इसी से यकीन होता हैं कि गूगल अपने कंपनी में बेस्ट लोग ही लेते हैं जिनमें टॉप परफ़ॉर्मर बनने का पोटेंशियल होता है.2011  में, आर्चबिशप डेसमंड टूटू (Archbishop Desmond Tutu) ने  80 साल पूरे करने पर, अपने जन्मदिन पर भाषण देने के लिए दलाई लामा को invite किया गया था.

दलाई लामा और आर्कबिशप टूटू दोनों को नोबेल पीस अवार्ड मिले थे. उनकी मीटिंग हिस्ट्री में एक इम्पोर्टेन्ट वाकया बनने वाली थी . लेकिन, चाइनीस गवर्नमेंट ने बीच में आकर अफ्रीका के गवर्नमेंट को दलाई लामा को वीसा न देने के लिए मना लिया. दलाई लामा अब इस भाषण में शामिल नहीं हो सकते थे जिससे आर्चबिशप टूटू को बहुत दुःख हुआ.उस टाइम, गूगल में नए आए गूगलर लॉरेन ग्रोव्स ने अपना पहला प्रोडक्ट- गूगल हैंगऑउट को लॉन्च किया था. लॉरेन ने दलाई लामा और आर्चबिशप के बीच गूगल हैंगऑउट के द्वारा मीटिंग करवाई जिससे हज़ारों मील दूर होते हुए भी दोनों ने एक दूसरे से आमने-सामने बात की. ये टेक्निक इस सेलिब्रेशन का हाईलाइट था और गूगल ने इसे न्यू यॉर्क टाइम्स में अड्वर्टाइज़ किया. ये नए गूगलर लॉरेन की पहल थी जिन्हें कंपनी को ज्वाइन किये हुए सिर्फ पांच दिन हुए थे.

सभी परफॉरमेंस मैनेजमेंट क्यों नापसंद करते हैं और हमने इसके बारे में क्या किया.

हमारी पूरी ज़िन्दगी हमें अपने परफॉरमेंस के बेसिस पर रेट किया जाता हैं. कंपनीज़ भी अपने एम्पलॉईस के परफॉरमेंस को रेट करते ही रहते हैं. ये परफॉरमेंस इवैल्यूएशन करते रहना ज़रूरी होता हैं क्योंकि इससे एम्पलॉईस को पता चलता हैं कि क्या वे कंपनी के और खुद के पर्सनल गोल्स को हासिल कर रहे हैं या नहीं. इसके अलावा, परफॉरमेंस इवैल्यूएशन की मदद से कंपनी ये फ़ैसला ले पाते हैं कि क्या वे किसी एम्प्लॉई के सैलरी को बढ़ाए या नहीं और उनको प्रमोशन दें या नहीं.ज़्यादातर कंपनीज़ के परफॉरमेंस मैनेजमेंट, जिन पर परफॉरमेंस अस्सेस्मेंट करने की ज़िम्मेदारी होती हैं, वे इस काम में काफी टाइम लगाते हैं और अपने एम्पलॉईस को फीडबैक भी नहीं देते जिससे एम्पलॉईस नाखुश होते हैं.

कुछ मैनेजर्स अपनी सोच या फिर भेदभाव के कारण सही परफॉरमेंस रेटिंग नहीं कर पाते जिससे एम्पलॉईस को महसूस होता हैं कि उनकी रेटिंग्स गलत हैं. क्या आपको जानना है कि गूगल ने इन चैलेंजेस का सामना कैसे किया और आप अपने कंपनी में इसे कैसे अप्लाई कर सकते हैं?पहली बात, गोल्स को सही ढंग से सेट कीजिये. सभी एम्पलॉईस को इन गोल्स के बारे में बताइये. हर तीन महीने,  लैरी पेज ऑब्जेक्टिव एंड की-रिजल्ट्स ( OKR ) सेट करते हैं और सभी एम्पलॉईस को अपने OKR से गूगल के OKR से मिलाना होता हैं.

इसमें, ऑब्जेक्टिव तो लम्बे टाइम वाले गोल्स होते हैं जबकि की-रिजल्ट्स छोटे-छोटे गोल्स होते हैं जिनकी मदद से आप उन ओब्जेक्टिव्स को हासिल कर सकते हैं. गूगल में काम करने वालों के लिए जो वेबसाइट बनी हैं, उस इंटरनल साइट में एम्पलॉईस इन OKR को देख सकते हैं ताकि वे खुद के और दूसरों के भी परफॉरमेंस को ट्रैक कर सकें. दूसरी बात, साथ काम करने वालों से फीडबैक लीजिये. सिर्फ मैनेजर्स से ही नहीं बल्कि टीम के दूसरे मेंबर्स से भी फीडबैक लेनी चाहिए. टीम के सारे मेंबर्स को एक दूसरे के परफॉरमेंस को रिव्यु करने चाहिए.तीसरी बात, एक कैलिब्रेशन प्रोसेस रखनी चाहिए.

इस कैलिब्रेशन प्रोसेस में, मैनेजर्स को एक साथ बैठ कर सारे एम्पलॉईस के रेटिंग्स पर विचार करनी चाहिए. इससे बायस भी ख़त्म हो जाती हैं और परफॉरमेंस मैनेजमेंट प्रोसेस भी बेहतर तरीके से काम करती हैं.आखिर में, एम्पलॉईस के साथ परफॉरमेंस रेटिंग की बात करते हुए, रिवॉर्ड और डेवलपमेंट की बातों को अलग-अलग ही रखिए. आम तौर पर  गूगल के एनुअल परफॉरमेंस रिव्यु नवंबर में होते हैं और उसके अगले महीने ही सैलरी के बारे में डिस्कशन होते हैं. ये इसलिए क्योंकि गूगल का भरोसा हैं कि डेवलपमेंट और रिवॉर्ड एक दूसरे से बहुत अलग बातें हैं.

सबकुछ मज़ेदार और आसान नहीं होता

कोई भी ऑर्गनाइज़ेशन या कंपनी परफेक्ट नहीं होती. कुछ न कुछ बातों में गलती हो ही जाती हैं लेकिन ज़रूरी ये हैं कि कंपनी इन गलतियों से कैसे सीख लेती हैं और उसके नतीजों से कैसे डील करती हैं. क्या आप भी इस बात को मानते हैं? किसी और कंपनी की तरह ही गूगल ने भी अपने पीपल प्रैक्टिस में गलतियां की थी. गूगल के लिए चैलेंज ये था कि कैसे वो कंपनी के वैल्यू को बरकरार रखते हुए, मुश्किल वक़्त में भी अच्छा काम करे. अगर कंपनी में कोई गलती करता हैं, फिर चाहे वो मैनेजर हो या कोई दूसरा एम्प्लॉई, सबको उस गलती के बारें में पता होना चाहिए. इस तरह ट्रांसपरेंट रहना बहुत ज़रूरी हैं. इससे सबको सिचुएशन के बारें में पता चलता हैं और ऐसी गलती दोबारा होने से बचा जा सकता हैं.दूसरी बात जो आपको हमेशा याद रखनी चाहिए, वो हैं अपने हिस्से या हक़ की चीज़ों को मना करना. कभी-कभी, कुछ मिलने पर आपको लगने लगता हैं कि आप ही सबसे डिज़र्विंग शख्स हैं और आपके अलावा कोई उसके लायक नहीं.

ऐसा मन में आना बहुत नेचुरल सी बात हैं पर इसे ज़िम्मेदारी और प्रैक्टिस के साथ दूर किया जा सकता हैं. कंपनी के एम्पलॉईस को जब भी बेनेफिट दें, उनको ज़िम्मेदारी का एहसास भी करवाइये. जब भी कंपनी के लिए कोई डिसीज़न्स लें, सभी को इसमें शामिल कीजिये. जहां से भी मिले, सलाह लीजिये. हो सकता हैं कुछ एम्पलॉईस बहुत शर्मीले हो और उन्हें अपने ओपिनियन, अपनी राय रखने में हिचक हो. ऐसे लोग पूछने पर भी अपनी राय नहीं बता पाते. लेकिन, ज़रूरी हैं कि चाहे जितना भी वक्त लगे, कंपनी के पालिसी बदलने में या फिर कोई और चेंज में सबकी राय पता करनी चाहिए.

जो भी गड़बड़ी होती हैं, उसे ठीक कीजिये. अगर आपके एम्पलॉईस किसी मुश्किल में हैं, आपको आगे आकर फ़ौरन कोई सोल्युशन देना चाहिए. एक बार सबकुछ ठीक हो जाए तो अपनी गलती मानकर सभी को इससे सीख लेने के लिए कहना चाहिए. 2008 में, गूगल के एक शेफ ने लंच में एक स्वीट डिश ऑफर किया जिसका नाम रखा गया था ” फ्री तिबेट गोजी-चॉकलेट क्रीम पाई विथ मैकडेमिया कोकोनट डेट क्रस्ट”. इस मेनू के आने के बाद, एक गूगलर ने मैनेजमेंट को एक इ-मेल लिखा कि अगर इस डिश के बारें में नहीं एक्सप्लेन नहीं किया जाएगा तो वो इसके विरोध में, इसके प्रोटेस्ट में कंपनी छोड़ देगा. 

उस दिन शेफ ने स्वीट डिश में जो गोजी बेरीज डाले थे, वो तिबेट से आए थे और चूँकि गूगल में सारे डिश फ्री में दिए जाते थे इसलिए शेफ ने इसे फ्री-तिबेट का नाम दिया था. इस नाम से काफी गूगलर्स के बीच पोलिटिकल बहस हुई थी जो तिबेट का चाइना से फ्री होने को लेकर था. दुःख की बात ये थी कि इस वजह से उस शेफ को उसके मैनेजर ने तीन दिनों के लिए ससपेंड कर दिया था.इस वाकये के बाद, लाज़लो का गूगल में फ्रीडम ऑफ़ स्पीच यानी बोलने की आज़ादी की ज़रूरत महसूस हुई. उन्होंने सोचा कि अगर गूगलर्स को इतनी छोटी-छोटी बातों पर सज़ा मिलती रहे तो वे कैसे अपनी कंपनी और उसके मिशन पर भरोसा कर सकते हैं. बॉक ने उस शेफ को वापस काम पर बुलाया जिससे काफी सारे गूगलर्स ने बॉक और मैनेजमेंट का शुक्रिया अदा किया.  फ्रीडम ऑफ़ स्पीच के लिए ये बहुत ज़रूरी स्टेप था. वैसे, किसी बात पर डिबेट करना कोई जुर्म तो था ही नहीं.

कन्क्लूज़न.

इस बुक में आपने सीखा कि पीपल प्रैक्टिस क्यों इतना ज़रूरी हैं और इसका एम्पलॉईस को खुश रखने में क्या कंट्रीब्यूशन है. आपने ये सब गूगल कंपनी के एग्जाम्पल से सीखा.आपने जाना, किसी कंपनी के फाउंडर होने के नाते लोगों को पनपने और आगे बढ़ने के ओपोर्चुनिटीज़ देने की जरूरत होती है. आपने ये भी जाना कि किसी कंपनी में कल्चर रखने के क्या फायदे होते हैं. कंपनी का मिशन सिर्फ प्रॉफिट कमाना या कस्टमर्स को बेस्ट सर्विस देना नहीं है, इनके कुछ मोरल रेस्पॉन्सिबिलिटीज़ यानि नैतिक ज़िम्मेदारी भी होते हैं जिससे यहां काम करने वालों को अपने काम के साथ ये भी एहसास होता हैं कि वे समाज के लिए कुछ अच्छा कर रहे हैं. ऐसा करने पर एम्पलॉईस को अपना काम बोझ जैसा नहीं लगेगा.आपने ये भी जाना कि ट्रेनिंग के बजाय आपको रिक्रूटमेंट में पैसे लगाने चाहिए. ख़ास टैलेंट वाले लोगों को हायर करने में टाइम लगता हैं पर जितना भी टाइम लगे, वेट करना फायदेमंद हैं. लोगों को आपके कंपनी को ज्वाइन करने के कारण दीजिये. इसके अलावा, आपने सीखा कि एम्पलॉईस के परफॉरमेंस को रेट करने के लिए सिर्फ मैनेजर ही की नहीं बल्कि साथ काम करने वालों की भी राय लेनी चाहिए.

अप्रैज़ल या सैलरी बढ़ाने के मामले में सही फैसला लेने के लिए, टीम के सभी लोगों को शामिल करना चाहिए.आखिर में, आपने ये जाना कि पीपल मैनेजमेंट में गलती हो जाने पर कैसे सबके सामने अपनी गलती को मान कर उसे सुधारना चाहिए. ऐसा करने पर कंपनी के बाकी लोग भी इस गलती से सीखेंगे और इसे कभी नहीं दोहराएंगे.सबका लीडर बनना एक बड़ी ज़िम्मेदारी हैं. क्या आप भी लीडर बनकर इस चैलेंज का सामना करने को तैयार हैं? ये बात सही है कि किसी कंपनी के सारे लोगों को मैनेज करना आसान नहीं. आपके आगे बहुत सारे मुश्किलें आएँगी खासकर तब जब आप अलग- अलग माइंडसेट के लोग, उनके अलग पर्सनालिटी और अलग-अलग बैकग्राउंड को हैंडल करेंगे.

लेकिन, आपको हमेशा ये याद रखना हैं कि आप भी एक लीडर हैं और बिना कारण लीडर नहीं बने हैं. दूसरों के लीडर बनना सिर्फ पावर और अधिकार की बात नहीं हैं, इसके साथ आपको दूसरों को आगे आने का मौका देना चाहिए और उनको उनकी मंज़िल तक पहुंचने में भी मदद करनी चाहिए. हमेशा याद रखिए कि किसी भी ऑर्गनाइज़ेशन में उसके एम्पलॉईस एक बहुत ज़रूरी हिस्सा होते हैं इसलिए अपने सक्सेस के रास्ते में इनको साथ ही लेकर चलिए. 

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