The art of public speaking – This Amazing Book by Dale Carnegie

The art of public speaking – This Amazing Book by Dale Carnegie

यह किताब आपको क्यों पढ़नी चाहिए 

आज के वक्त में दुनिए को लीडर्स की बहुत ज्यादा जरूरत है। हमें वो लोग चाहिए जो हमारे समाज को पहले से बेहतर बनाने के लिए काम कर सकें। हमें वो लोग चाहिए जो एक बेहतर बिजनेस खड़ा कर के अच्छे प्रोडक्ट मार्केट में ला सकें जिससे लोगों का फायदा हो। लेकिन यह सब कर पाने के लिए उन्हें एक कला में माहिर बनना होगा – पब्लिक स्पीकिंग। The art of public speaking

दुनिया के किसी भी कामयाब व्यक्ति को ले लीजिए, उसमें यह ताकत होती है कि वो बहुत से लोगों को एक साथ प्रभावित कर सकता है। लेकिन बहुत से लोग स्टेज के नाम से ही काँपने लगते हैं। कामयाब तो हर कोई बनना चाहता है, लेकिन यह वो डर है जिससे लड़ने जाने पर बड़े से बड़ा आदमी एक बार जरूर घबराता है।

यह किताब आपके इस डर का समाधान है। यह आपको बताती है कि किस तरह से आप पब्लिक स्पीकिंग की कला में माहिर बन सकते हैं।

इसे पढ़कर आप सीखेंगे

  • -किस तरह से आप पब्लिक स्पीकिंग सीख सकते हैं।
  • -किस तरह से आप गले और फेफड़े की कसरत कर के अपनी आवाज को बेहतर बना सकते हैं।
  • -अपने सुनने वालों को एक भीड़ में इकट्ठा करना क्यों जरूरी है।

एक बेहतर पब्लिक स्पीकर बनने के लिए आपको खुद के बारे में ना सोचकर अपने टापिक के बारे में सोचना होगा।

हम सभी लोग गाड़ी चलाना किताब पढ़कर नहीं सीखते। अगर किसी भी व्यक्ति को गाड़ी चलाना सीखना होता है, तो वो उसे चलाकर सीखता है और लगभग हर कोई उस पर से एक ना एक बार जरूर गिरता है। ठीक उसी तरह से अगर आपको पब्लिक स्पीकिंग सीखना है तो आपको लोगों के सामने जाकर बोलना होगा। शुरुआत में आप से गलतियां जरूर होंगी, लेकिन वो सभी के साथ होती हैं। उन्हीं गलतियों से आप बेहतर तरीके से बोलना सीखते हैं। The art of public speaking

दुनिया के महान पब्लिक स्पीकर्स भी जब पहली बार स्टेज पर गए थे तो उन्हें घबराहट हुई थी। लेकिन पब्लिक स्पीकर बनने का मतलब यह नहीं होता कि आपको डर ही ना लगे। इसका मतलब होता है कि आपको उस डर को काबू करना आना चाहिए। अब आप सोच रहे होंगे कि किस तरह से आप अपने डर से आज़ाद हो सकते हैं? इसके लिए आप तीन तरीके अपना सकते हैं।

सबसे पहले तो अपने बारे में सोचना छोड़ कर अपने दिए गए टापिक के बारे में सोचिए। बहुत से लोग स्टेज पर जाते ही सोचने लगते हैं कि लोग उनके बारे में क्या सोच रहे हैं या फिर कहीं वे देखने में कुछ खराब तो नहीं लग रहे। आप यह सब ना सोचकर अपने मैसेज पर ध्यान दीजिए जो आप लोगों तक पहुंचाने के लिए आए हैं। The art of public speaking

इसके बाद अपनी बात को पहले से ही तैयार कर के जाइए। बहुत से लोग बिना तैयारी किए स्टेज पर चले जाते हैं और वहाँ जाकर यह भूल जाते हैं कि उन्हें बोलना क्या था। इस तरह से वे और घबराने लगते हैं। इसलिए हमेशा अपनी स्पीच को याद और प्रैक्टिस कर के जाइए।

इसके बाद अंत में जब आप बोलने के लिए जाइए तो यह उम्मीद कीजिए कि आप असल में बोलने में कामयाब होंगे। अपनी विनम्रता को बनाए रखिए।अपने डर को बगल में रख कर एक खुले दिमाग के साथ बोलिए। शुरुआत में सभी खराब करते हैं, लेकिन कुछ वक्त तक प्रैक्टिस कर लेने के बाद सारे ही लोग अच्छा बोलने लगते हैं।

एक टोन में ना बोलकर अपनी बात के जरूरी शब्दों पर जोर दीजिए। The art of public speaking

गाने सुनते वक्त आपने यह देखा होगा कि उसमें अलग अलग धुन का इस्तेमाल होता हैं। जरा सोचिए आपका मनपसंद गाना सुनने में कैसा लगता अगर उसमें सिर्फ एक तरह का धुन बजता और गाने वाला सिर्फ एक टोन में गाए जाता? कोई भी चीज अगर पूरी तरह से सिर्फ एक खूबी को दिखाए तो वो खूबसूरत नहीं लगती। सोचिए अगर दुनिया सिर्फ एक ही रंग में रंगी होती तो कैसा लगता? आपके आस पास हर जगह सब कुछ सफेद रंग का हो जाए तो कैसा लगेगा?

यहाँ पर कहने का मतलब यह है कि बोलते वक्त कभी इस तरह से मत बोलिए कि सुनने वाले को लगे आप रट कर कुछ बोल रहे हैं। अपने टोन को जरूरत के हिसाब से बदलते रहिए और अपने वाक्य के जरूरी हिस्सों पर जोर देकर बोलिए।

एक्ज़ाम्पल के लिए अगर आपको कहना है – कामयाब आपकी किस्मत का नहीं, बल्कि आपके कर्मों का नतीजा है।

तो यहाँ पर आप इस वाक्य के कुछ जरूरी शब्दों को पहचानिए, जैसे कामयाबी, किस्मत, कर्मों और नतीजा। अब आप इन जरूरी शब्दों को थोड़ा सा जोर देकर बोलिए ताकि ये शब्द सुनने में बाकी के शब्दों से अलग लगें।

लेकिन जोर देकर बोलने का मतलब यह नहीं है कि आप उसे चिल्ला कर कहें। इसका मतलब है उसे कुछ अलग तरह से कहना ताकि सुनने वाला यह समझ जाए कि वो शब्द वाक्य के जरूरी शब्द हैं। अगर आप जोर से बोल रहे थे, तो उन जरूरी शब्दों को आराम से कहिए। अगर आप आराम से बोल रहे थे तो उन शब्दों को जोर से कहिए। या फिर आप उसे अपने स्टाइल में कुछ अलग तरह से कहने की कोशिश कीजिए ताकि वो बाकी के शब्दों से अलग लगे। The art of public speaking

अपनी बात के जरूरी हिस्से को अलग तरह से बोलने के तीन तरीके हो सकते हैं। सबसे पहला है अपने स्पिच को बदलना, दूसरा है अपने बोलने की रफ्तार को बदलना और तीसरा है कुछ देर तक रुक कर बोलना।

जब हम कुछ मजेदार बात बता रहे होते हैं तो हम तेज बोलते हैं और जब कुछ खूबसूरत लम्हों की बात करते हैं तो आराम से बोलते हैं। इससे हमारे टोन अलग हो जाते हैं। The art of public speaking

इसके बाद अगर आप अपनी जरूरी बात को बोलने से ठीक पहले या ठीक बाद कुछ देर के लिए रुक जाएंगे तो वह बात बाकी की बातों से अलग लगेगी या फिर अगर आप अपने वाक्य की शुरुआत तेज रफ्तार में बोलते हुए करेंगे और उसके अंत में उसे धीरे बोलेंगे तो वो भी सुनने में अलग लगेगा। इस तरह से आप अपनी स्पीच को आकर्षक बना सकते हैं।

अपनी बात के जरिए अपने लोगों में भावनाएं पैदा करने वाला व्यक्ति बहुत अच्छा स्पीकर होता है।

इंसान हमेशा अपनी भावनाओं के आगे मजबूर हो जाता है। यही वो चीज़ है जो हमारी जिन्दगी में रंग डालती है और इसे खूबसूरत बनाती है। अगर आप किसी तरह से अपने सुनने वालों के अंदर एक भावना पैदा कर सकें, तो वे आपको बहुत पसंद करने लगेंगे। लोग इसीलिए कामेडी शो ज्यादा देखने जाते हैं और एक डाक्यूमेंट्री कम देखते हैं क्योंकि कामेडी में एक भावना को पैदा करती है – खुशी।

सिर्फ यही नहीं, सेल्स में भी जब हम ग्राहक की भावनाओं पर ज्यादा ध्यान देते हैं तो हम अपने प्रोडक्ट को आसानी से बेच पाते हैं। लोग नया आईफोन इसलिए नहीं खरीदते क्योंकि वो अच्छा है। आईफोन ऐसा कोई भी फीचर नहीं देता जो सैमसंग या ओप्पो या वीवो नहीं देते। लेकिन अगर आपके सामने आईफोन और दूसरे स्मार्टफोन्स रख दिए जाएं, तो संभावना ज्यादा है कि आप आईफोन को चुनेंगे। क्यों? क्योंकि लोगों को लगता है कि उसे इस्तेमाल करने से उनका दर्जा उठ जाता है।

भावनाएं हमारी जिन्दगी को चलाती हैं। इसलिए अगर आप किसी तरह से भावनाओं पर काबू पा लें तो आप लोगों के दिलों पर काबू पा सकते हैं।

किस तरह से आप लोगों में भावना पैदा कर सकते हैं? आसान शब्दों में, प्रैक्टिस कर के। आप जिस भी टापिक पर बोल रहे हैं, आपको उसके अंदर पूरी तरह से घुसना होगा। उसे अपनी आत्मा में बसा लीजिए और उसमें पूरी तरह से उतर जाइए।

जब एक्टर्स अपने रोल की तैयारी करते हैं तो वे उसमें भावनाएं पैदा करने के लिए पूरी तरह से कैरेक्टर में उतर जाते हैं।

शूटिंग से कुछ घंटे पहले से ही वे खुद को एक कमरे में बंद कर लेते हैं और सिर्फ एक सीन के लिए प्रैक्टिस करते रहते हैं। इस तरह से वे देखने वालों के अंदर भावनाएं पैदा कर पाते हैं और उनका दिल जीत पाते हैं। अगर आपको भी ऐसा करना है, तो आपको भी अपने टापिक को अच्छे से तैयार करना होगा। The art of public speaking

बोलने के साथ ही आपको अपने गेस्चर पर भी ध्यान देना होगा। The art of public speaking

गेस्चर का मतलब होता है बोलते वक्त अपने हाथ और अपने शरीर को अपनी स्पीच के हिसाब से हिलाना। यह वो इशारे होते हैं जिसे देखकर लोग आपकी बात को अच्छे से समझ पाते हैं। इसमें माहिर बनने के लिए भी आपको प्रैक्टिस की जरूरत होगी।

सबसे पहले तो इन्हें जबरदस्ती बाहर लाने की कोशिश मत कीजिए। गेस्चर आपके अंदर से अपने आप निकलने चाहिए और अगर आप जबरदस्ती इसे बाहर निकालने की कोशिश करेंगे तो लोगों को तुरंत पता लग जाएगा कि वो नकली है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप उसे प्रैक्टिस नहीं कर सकते।
गेस्चर को बेहतर बनाने के लिए आप उसे बार बार प्रैक्टिस कर सकते हैं। यह जरूरी नहीं है कि आप हर एक गेस्चर को एक ही तरीके से प्रैक्टिस करें और हर बार उसे उसी तरह से इस्तेमाल करें। कभी कभी यह संभव भी नहीं होता।

यह आपके अंदर से समय समय पर अपने आप निकलने चाहिए। आप अगर एक होनहार स्पीकर को एक ही स्पीच दो बार देते हुए सुनिए तो आप यह देखेंगे कि उनके गेस्चर बदलते रहते हैं।

इसके बाद आपको यह ध्यान देना होगा कि आपके अंदर से जो गेस्चर निकल रहे हैं वो आपकी स्पीच और आपके टोन के साथ मैच खा रहे हैं या नहीं। बहुत बार हम ऐसे गेस्चर कर देते हैं जो कि बहुत खराब लगते हैं। इसके लिए आप शीशे में देखकर उसे प्रैक्टिस कर सकते हैं। आप यह देखिए कि कौन से गेस्चर अच्छे लग रहे हैं, किसे सुधारा जा सकता है और किसे आपको निकालने की जरूरत है। The art of public speaking

समय के साथ आपको इसकी आदत पड़ जाएगी और आप इसे बेहतर तरीके से कर पाएंगे।
यहाँ पर सबसे जरूरी बात यह है कि वे गेस्चर आपके अंदर से प्राकृतिक रूप से निकलने चाहिए। नकली गेस्चर का इस्तेमाल करना बिल्कुल वैसा ही है जैसे अपने बगीचे के सूखे हुए पौधों को हरे रंग से रंग देना। आप इसकी जितनी ज्यादा प्रैक्टिस करेंगे, आपके लिए यह उतना आसान हो जाएगा।

इसके अलावा बहुत ज्यादा गेस्चर करने से लोगों का ध्यान भटकने लगता है। यह याद रखिए कि आप अपने हाथों को या अपने शरीर को हद से ज्यादा मत हिलाइए। साथ ही अपने चेहरे के हाव भाव पर भी ध्यान दीजिए। Amazing facts in Hindi

अपनी आवाज को अच्छा बनाने के लिए अपने गले और फेफड़ों का खयाल रखिए।

जब हम बोलते हैं तो हमारे फेफड़ों से हवा हमारे गले तक जाती है जिससे कि आवाज बाहर निकलती है। दूसरे शब्दों में, हम जब बोलते हैं तो हमारे फेफड़ों पर प्रेशर पड़ता है और ज्यादा जोर से काफी देर तक बोलते रहने पर सीने में दर्द हो सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि आप अपने फेफड़ों का और अपनी सेहत का अच्छा खयाल रखें।

लेखक एक ऐसे पब्लिक स्पीकर को जानते थे जो बोलने की प्रैक्टिस भागते हुए करता था। इससे उसके फेफड़ों में ज्यादा हवा जाती थी और उसकी कसरत होती थी, जिससे कि स्टेज पर वो लम्बे समय तक बोल पाता था। आप चाहें तो यह तरीका अपना सकते हैं या फिर एक दूसरे तरह से भी कसरत कर सकते हैं, जो कि नीचे दिया गया है। The art of public speaking

सबसे पहले अपने हाथों को अपने कमर पर रखिए और एक हाथ की उंगली को दूसरे हाथ ही उंगली से छूने की कोशिश कीजिए। इससे आप अपने फेफड़ों को दबा रहे हैं जिससे कि सारी हवा बाहर निकल रही है। इसके बाद अपने कंधों को ऊपर उठाए बिना आप साँस अंदर खींचिए। इसे बार बार दोहराइए।

फेफड़ों के अलावा आपका गला भी अच्छे से बोल पाने के लिए बहुत जरूरी होता है। इसकी कसरत करने के लिए अपनी गर्दन को फिक्स कर के अपने सीने को लेफ्ट-राइट घुमाइए। ऐसा करते वक्त अपने सिर को आगे की तरफ झुकाइए। इससे आपके गले को राहत मिलेगी।

गले को खोलने के लिए आप अपने मुँह को खोलिए और उसे पूरी तरह से खुला रखकर बोलने की कोशिश कीजिए। इससे आपकी आवाज की क्वालिटी अच्छी हो जाएगी।

लेकिन आवाज अच्छी होने का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि वो तेज हो। इसका मतलब यह भी है कि वो साफ हो और स्टेज के पीछे जो लोग बैठे हैं वो भी आपकी बात को अच्छे से और साफ साफ सुन पाएं। अगर आपकी आवाज साफ होगी तो आपके फुस्फुसाने पर भी लोग आपको अच्छे से समझ पाएंगे।

ऐसा कर पाने के लिए आप अपने हाथ को अपने मुंह के पास लगाइए और यह शब्द जोर जोर से बोलिए। “क्रैश”, “डैश”, “व्हिर्ल”, “बज़्ज़”। इन शब्दों को तब तक बोलते रहिए जब तक आप इनके वाईब्रेशन को अपने हाथों पर महसूस ना करने लगें।

अपने सुनने वालों को एक भीड़ में इकठ्ठा  कीजिए ताकी आप अपनी बात को लोगों तक अच्छे से पहुंचा सकें।

क्या आपने कभी यह देखा है कि किसी सेमिनर में एक व्यक्ति ताली बजाता है और फिर सारे ही लोग अचानक से तालियाँ बजाने लगते हैं? क्या आपके साथ कभी यह हुआ है कि आपके ग्रुप में सारे लोग अचानक से ऊपर देखने लगते हैं और आप भी उसी वक्त ऊपर देखने लगते हैं? इंसानों की इस खूबी को कौन्टैजियन कहते हैं, जिसका हिन्दी में मतलब होता है – एक व्यक्ति के विचार या रोग का दूसरे व्यक्तियों तक पहुंचना। इ

सका आसान सा मतलब होता है – एक चीज़ का फैलाव।

इसका मतलब यह है कि अगर आप अपने सुनने वालों को एक भीड़ में इकट्ठा कर लेंगे, तो आप अपने विचारों को उन तक आसानी से पहुंचा सकते हैं। भीड़ में विचारों को इंफेक्शन बहुत तेजी से फैलता है। अगर एक भीड़ भरी जगह पर एक व्यक्ति अचानक से चिल्लाने लगे – “आग, आग, भागो भागो”, तो सारे लोग पागलों की तरह भागने लगेंगे।

इसलिए अगर आप चाहते हैं कि सब लोग आपके विचारों को सुनें, तो उन्हें अलग अलग मत बैठने दीजिए। उन सभी को एक भीड़ में इकट्ठा कर लीजिए।

यह करने के लिए आप सबसे पहले उन अलग बैठे लोगों के पास चलते हुए जाइए और उनकी जरूरतों के बारे में, डर के बारे में और भावनाओं के बारे में बातें कीजिए। एक बार जब उन अलग बैठे लोगों को लगने लगेगा कि यहाँ पर उनके जैसे विचार वाले लोग बैठे हैं, तो वे भीड़ में जाकर मिल जाएंगे और आपकी बात को अच्छे से सुनेंगे।

लेकिन बहुत से लोग इस बात को नहीं मानते कि भीड़ में बैठने पर सारे लोग एक तरह से सोचते हैं। अगर आपको इस बात पर अब भी कोई शक है, तो इतिहास के इस एक्ज़ाम्पल पर एक नजर डालिए। 19वीं शताब्दी में सोवियत की सरकार ने यह नियम लागू किया कि कोई भी कहीं भी भीड़ नहीं लगाएगा।

उन लोगों को इस बात का डर रहता था कि अगर सारे लोग एक साथ आने लगेंगे तो सरकार से बगावत करने की चाहत अचानक फैलने लगेगी और उन लोगों को हड़ताल का सामन करना पड़ सकता है।
इसलिए आपको भीड़ इकट्ठा करने की काबिलियत अपने अंदर विकसित करनी होगी। क्योंकि इसमें वो ताकत है जिससे सरकारें गिराई जा सकती हैं।

अपने बहस करने की ताकत को बढ़ाइए।

बहुत बार हम कुछ ऐसी बातें बोल देते हैं जिसे साबित कर पाने में हमें परेशानी होती है। कभी कभी हम अपनी राय देने लगते हैं और बहुत से लोग उस राय को नहीं मानते।

इसलिए यह बहुत जरूरी है कि आप जो भी बोलें, उसे साबित करने की ताकत भी रखें, वरना आपकी कही गई बात को आपके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।

साथ ही अगर आप अपनी बात को साबित नहीं कर पाएंगे, तो लोग आप पर भरोसा नहीं करेंगे। इसके अलावा अगर आपकी कभी किसी से बहस हो जाए तो आपको उसकी बात का जवाब देना भी आना चाहिए। अपनी बात को साबित करना, और दूसरों से बहस करना, यह दोनों ही जरूरी हैं।

इसलिए आपको यह भी सीखना होगा कि किस तरह से आप अपनी बात को सही साबित कर सकते हैं और यह भी सीखना होगा कि किस तरह से आप अपने विरोधियों की बात को गलत साबित कर सकते हैं। इसके लिए आपको चार बातों पर ध्यान देना होगा वो बात जिस पर बहस हो रही है, उस बात को साबित करने के सबूत, उस बात के और कौन से मतलब हो सकते हैं और उस बात के नतीजे।

नीचे दिए गए 8 सवालों की मदद से आप इन पहलुओं पर ध्यान देकर वो दोनों काम कर सकते हैं।
जिस बात पर बहस हो रही है, उसे अच्छे से समझने के लिए आप खुद से पूछिए कि क्या उसे साफ साफ शब्दों में कहा गया है। दूसरा सवाल खुद से यह पूछिए कि जो कुछ भी कहा गया है क्या उसे पूरी तरह से कहा गया है। क्या पूरी जानकारी दी गई है? कहीं उस जानकारी में कुछ कमी तो नहीं है?

इसके बाद आप उस बात को साबित करने के सबूत पर ध्यान दीजिए। खुद से यह सवाल पूछिए – उस बात को किस एक्सपर्ट ना कहा है? क्या वो व्यक्ति वाकई में एक एक्सपर्ट है? क्या वो सही से सोच समझ सकता है? दूसरा सवाल यह पूछिए – क्या सारे फैक्ट्स पर ध्यान दिया जा रहा है? क्या वो सारे फैक्ट्स एक ही बात कह रहे हैं या अलग अलग? क्या वो सच में फैक्ट्स हैं या फिर किसी की राय है?

इसके बाद बारी आती है यह समझने की कि उस बात के और कौन कौन से मतलब हो सकते हैं। जिन फैक्ट्स के आधार पर उस बात को कहा जा रहा है, कहीं उसका कुछ दूसरा मतलब तो नहीं निकल सकता? दूसरा सवाल यह कि आप जो बात कह रहे हैं, उसे गलत साबित करने के लिए कौन कौन सी बात कही जा सकती है।

इसके बाद अंत में आता है कही गई बात के नतीजे क्या हो सकते हैं। इसमें आप खुद से यह पूछएि कि कहीं आप ने कुछ ऐसा तो नहीं कहा है जो सबूतों पर आधारित नहीं है? और दूसरा सवाल यह कि क्या सारे सबूत एक ही बात की तरफ इशारा कर रहे हैं?

अपने सुनने वालों को एक कहानी सुनाइए ताकि वे कल्पना कर सकें। The art of public speaking

ज्यादातर लोगों को जानकारी, नंबर्स और स्टैटिस्टिक्स नहीं पसंद हैं। लोगों को यह जानने में बिल्कुल मजा नहीं आता कि पिछले 10 सालों में सिगरेट या शराब पीने से कितने लोगों की मौत हुई। अगर आप अपने टापिक में बहुत सी जानकारी डाल देंगे, तो वो एक दम सूखी हुई लगेगी। उसमें रस भरने के लिए आपको उसे मजेदार बनान होगा।

किसी भी चीज को मजेदार बनाने के लिए कहानियों का इस्तेमाल कीजिए। कहानियाँ सुनने पर हम कल्पनाएँ करने लगते हैं, हम अपने दिमाग में अलग अलग जगहों पर जाने लगते हैं और इस तरह से हम बोलने वाले की बात को कुछ ज्यादा ध्यान से सुनते हैं।

इसलिए अगर आप अपनी उसी बात में एक शराबी की कहानी के जरिए लोगों को इससे होने वाले नुकसान के बारे में बताएंगे, तो लोग उसे कुछ ज्यादा अच्छे से सुनेंगे। आप उनसे बताइए कि किस तरह से वो व्यक्ति रोज शराब पीकर अपनी पत्नी से झगड़ा करता था, अपने बच्चों को मारता था। इस तरह की कहानियाँ लोगों की भावनाओं के साथ खेलती हैं और उन्हें आप से चिपका कर रखती हैं।

इसके बाद आप खुद भी अपनी कल्पना का इस्तेमाल कीजिए। अपनी स्पीच को तैयार करते वक्त यह कल्पना कीजिए कि आपके सामने बहुत से लोग आपको सुनने के लिए बैठे हैं और वे आपको सुन रहे हैं। यह सोचने की कोशिश कीजिए कि आप उनके सामने किस तरह से बोलेंगे और आपकी बात को सुनने के बाद उनके क्या हाव भाव होंगे।

जब आप अपने दिमाग में अपने सुनने वालों को साफ साफ अपने सामने देखने लगें, तो यह कल्पना कीजिए कि आप उनके सामने बोलने पर कौन से गेस्चर का इस्तेमाल करेंगे। यह सोचिए कि उस गेस्चर का आपके सुनने वालों पर क्या असर होगा। किस तरह से आप अपने वाक्यों को कहेंगे।

पब्लिक स्पीकिंग का काम भी एक कवि या लेखक के काम की तरह होता है। अगर आप अपनी बात के जरिए लोगों के दिमाग में चित्र बना सकते हैं , तो आप भी एक अच्छे पब्लिक स्पीकर बन सकते हैं।

कुल मिलाकर

हर कला की तरह, पब्लिक स्पीकिंग की कला को भी प्रैक्टिस कर के सीखा जा सकता है। स्टेज पर जाने से पहले अपने टापिक को अच्छे से तैयार कीजिए और साथ ही अपनी सेहत का अच्छा खयाल रखिए ताकी आप लम्बे समय तक अच्छे से बोल सकें। अपनी बात के जरिए लोगों में भावनाएं पैदा करने की कोशिश कीजिए। हर रोज अच्छे से प्रैक्टिस कर के आप इसमें बेहतर बन सकते हैं।

अपने शब्दों के ज्ञान को बढ़ाइए।
अगर आपके पास इस्तेमाल करने के लिए बहुत सारे शब्द होंगे, तो आपकी स्पीच पहले से बेहतर होगी। इससे आप अपने विचारों को बेहतर तरीके से समझा पाएंगे। इसलिए अब से अगर आप कोई किताब पढ़ें, तो उसमें आने वाले उन शब्दों को नोट कर लीजिए जो आपके लिए नए हैं और फिर उन्हें अपनी स्पीच में इस्तेमाल कीजिए।

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