Breakfast with Socrates The Book by Robert Rowland Smith

Breakfast with Socrates The Book by Robert Rowland Smith

दो लफ़्ज़ों में -:

ब्रेकफास्ट विथ सोक्रेट्स (Breakfast With Socrates) में उन सभी फिलोसोफर्स के बारे में बताया गया है जिन्होंने जिन्दगी और उससे जुड़ी चीज़ों को समझने के नए और आसान तरीकों को खोजे। इस किताब से आप अपनी जिन्दगी से जुड़े छोटे और बड़े सवालों के जवाब पा सकेंगे।

यह किसके लिए है -:

  • – वे जो फिलोसोफी के बारे में जानना चाहते हैं।
  • – वे जो जिन्दगी को समझना चाहते हैं।
  • – वे जो हमारी दुनिया और अपनी जिन्दगी से जुड़े छोटे और बड़े सवालों का जवाब पाना चाहते हैं।

लेखक के बारे में -:

रोबर्ट रोलैंड स्मिथ (Robert Rowland Smith ) एक ब्रिटिश लेखक और फिलॅासफर हैं। वे फिलोसोफी , साइकोलॅाजी पॅालिटिक्स और आर्ट पर स्पीच देते हैं। उनकी कुछ प्रसिद्ध किताबों के नाम हैं डेरिडा एण्ड आटोबायेग्राफी ( Deridda and Autobiography ) आटोबायोफिलोसोफी ( AutoBioPhilosophy )। स्मिथ एक लेखक के अलावा एक व्यापार सलाहकार भी हैं।

फिलोसोफी का मतलब होता है समझदारी से प्यार।

इससे पहले हम फिलोसोफी पढ़ें, हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि फिलोसोफी यानि दर्शनशास्त्र क्या है। फिलोसोफी शब्द का जन्म ग्रीक शब्द फिलॅासफिया से हुआ है जिसका मतलब है समझदारी से प्यार करना।

इसके नाम से ही साफ है कि हम अपनी रोज़ की जिन्दगी में जो भी काम समझदारी से करते हैं वो फिलोसोफी है। अब चाहे ये समझदारी हम बाजार में मोल भाव करते समय दिखाएँ या फिर कोई बड़ा काम करते वक्त।

समझदारी और चालाकी में बहुत अंतर होता है। अगर आप किसी से बहस करके उसे बहस में हरा देते हैं तो आप चालाक हैं लेकिन अगर आप उससे बहस करते ही नहीं है तो आप समझदार हैं। फिलोसोफी हमें समझदारी सिखाती है चालाकी नहीं। Breakfast with Socrates

फिलोसोफी का मतलब ये भी होता है कि आप अपनी जिन्दगी से जुड़ी चीज़ों के बारे में छोटे बड़े सवाल करें। इन सवालों में से कुछ सवाल इस तरह के हो सकते हैं-:

मुझे बाज़ार में कितने पैसे खर्च करने चाहिए?

मुझे अपनी सेहत बनाए रखने के लिए कितना खाना चाहिए?

फिलोसोफी सिर्फ छोटे छोटे सवालों के बारे में ही नहीं है बल्कि इसका नाता बड़े बड़े सवालों से भी है। बड़े बड़े सवाल कुछ इस तरह के हो सकते हैं-:
इस दुनिया को किसने और क्यों बनाया?
अगर इस दुनिया को भगवान ने बनाया है तो फिर भगवान को किसने बनाया?

तो इन सभी बातों से एक बात साफ़ है कि फिलोसोफी का मतलब है अपनी जिन्दगी से जुड़े छोटे बड़े सवाल पूछना। इन सवालों से आप अपनी  जिन्दगी के फैसलों को अच्छे से ले सकते हैं। इसे ही समझदारी कहते हैं और समझदारी ही फिलोसोफी है। Breakfast with Socrates

आपका कुछ भी सोचना आपने होने का सबूत है।

क्या कभी कभी आपको ऐसा लगता है कि आपके आस पास की चीज़ें सिर्फ एक भ्रम है? क्या आप सच और सपने में अंतर जानना चाहते हैं।इस सबक में हम देस्कार्त (Descartes) की बातों को समझने की कोशिश करेंगे। देस्कार्त के एक फ़्रांसिसी फिलॅासफर थे जिन्होंने इस सवाल का जवाब दिया -:
क्या हमारा कोई अस्तित्व है या फिर हमें सिर्फ लगता है कि हम हैं? हम कैसे जान पाएंगे कि हम सपना देख रहे हैं या फिर जाग रहे हैं?

देस्कार्त ने इस बात को समझने के लिए अपने आस पास की सभी चीजों पर शक करना शुरू कर दिया। देस्कार्त को सिर्फ एक ही चीज पर पूरा विश्वास था कि वो शक कर रहे थे।

अपने शक करने पर शक ना करके उन्होंने हर चीज पर शक किया।देस्कार्त ने बताया कि अगर वे शक कर रहे हैं तो वे सोच रहे हैं। अगर वे सोच रहे हैं मतलब उनका अस्तित्व है। उनके हिसाब से आपका सोचना ही आपके होने का सबूत है। Breakfast with Socrates

देस्कार्त ने एक प्रसिद्ध पंक्ति दी- कोगितो इर्गो सम (Cogito, ergo sum)। इसका मतलब है – मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ।इसका मतलब है कि अगर आप सोचते हैं कि आप मर चुके हैं या फिर सपना देख रहे हैं या अगर आप सोचते हैं कि आपके आस पास की चीज़ें सिर्फ एक वहम है तो भी आपका अस्तित्व है क्योंकि आप सोच रहे हैं।

अपने व्यवहार को अच्छे से समझने के लिए हमें ईगो और सुपरईगो के बारे में जानना होगा।

क्या आप कभी कभी कुछ ऐसे काम करते हैं जिन्हें करने का आपका मन नहीं करता? हम सभी ने ऐसे काम जरूर किए हैं। लेकिन मन ना करने पर भी हम ऐसे काम क्यों करते हैं? इसका जवाब है सुपरईगो की ईगो पर जीत की वजह से। Breakfast with Socrates

20वीं शताब्दी में सिग्मंड फ्रीउड (Sigmund Freud) नाम के एक न्युरोलॅाजिस्ट ने दिमाग को समझने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि हमारे अंदर ईगो और सुपरईगो नाम की दो चीजें पाई जाती हैं। आइए इसे समझने की कोशिश करें।

ईगो हमेशा हमें आराम की तरफ लेकर जाता है। इसे ज्यादा तनाव में रहना नहीं पसंद है और ये बिल्कुल नहीं चाहता कि ये अपने बिस्तर को छोड़कर उठे और काम पर जाए।

दूसरी तरफ सुपरईगो हमारे अंदर की वो भावना है जो हमें वो काम करने पर मजबूर करती है जो जरूरी या सही है। घर की सफाई करना भले ही आपको ना पसंद हो लेकिन आप फिर भी घर साफ करेंगे क्योंकि वो काम जरूरी है।

ईगो हमें हमारी जरूरतों के बारे में बताता है जबकि सुपरईगो दुनिया की ज़रूरतों के बारे में।
जिसका सुपरईगो उसके ईगो पर हावी होता है वो एक अच्छा इंसान कहा जाता है। जैसे कि अगर कोई आपको उस गलती के लिए डाँट रहा है जो आपने नहीं की तो अगर आपका सुपरईगो हावी है तो आप उससे विनम्रता से बात करके उसे समझाने की कोशिश करेंगे। Breakfast with Socrates

रोज सुबह उठकर काम पर जाना किसी को भी नहीं पसंद है लेकिन फिर भी वे काम पर जाते हैं क्योंकि उनका सुपरईगो उनके ईगो से जीत जाता है।

आप भीड़ के साथ रहकर अपनी किस्मत पर जीत हासिल नहीं कर सकते।

नीटज़सचे (Nietzsche) अपने सुपरमैन के कॅान्सेप्ट की वजह से जाने जाते हैं। सुपरमैन वे होते हैं जो सपनों की दुनिया को छोड़कर अपनी हकीकत को अपनाते हैं।आज ज्यादातर लोग एक ही तरह का काम कर रहे हैं। वे रोज़ अपने घर से काम पर भागते हैं और तनाव में जीते हैं। अगर आप भीड़ में रहेंगे तो आप भी समय के साथ ऐसे ही हो जाएंगे।

हम सभी लोग अक्सर ही तनाव से परेशान हो कर अपने खयालों में उन चीज़ों के बाते में सोचते हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता। उदाहरण के लिए उस आदमी को ले लीजिए जिसे पैसों की ज़रूरत है। वो अपनी आँखों के सामने रखी हुई चीज के बारे में ना सोचकर ये सोच रहा है कि जिस दिन वो करोड़पति बनेगा उस दिन दुनिया घूमेगा।

भीड़ में रहने वाले लोग अक्सर ही ऐसे ख्वाब देखते हैं। अगर आप सुपरमैन बनना चाहते हैं तो आपको अपने असली हालातों को अपनाना होगा भले ही वे आपको अच्छे ना लगते हों। Breakfast with Socrates

खयालों में रहने वाले लोग कमजोर होते हैं। वे अपने असली हालातों को गले नहीं लगा पाते इसलिए वे एक ऐसी दुनिया में खोए रहते हैं जो कि है ही नहीं।
सुपरमैन वर्तमान में रहकर हर एक पल का आनंद लेते हैं और इसी तरह से वे अपनी किस्मत के मालिक बन जाते हैं।

पैसों की गुलामी की जंजीरों को तोड़ दीजिए।

आप अपनी नौकरी को किस नज़र से देखते हैं। क्या आप सारा दिन काम करने के बाद भी गरीबी में जी रहे हैं? लोगों को लगता है कि वो नौकरी से आराम कमा सकते हैं । इसलिए वे हर रोज़ अपने आराम को छोड़ कर काम करने जाते हैं। उन्हें खुद नहीं पता कि वे जीने के लिए काम कर रहे हैं या काम करने के लिए जी रहे हैं। तो फिर नौकरी का मतलब क्या होता है?नौकरी का सीधा सा मतलब होता है अपने काम के बदले में पैसे लेना।

19 वीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने नौकरी को एक अलग नज़र से देखने की कोशिश की। उनकी माने तो एक मजदूर हमेशा गरीब इसलिए रहता है क्योंकि वो पैसों की गुलामी करता है और एक गुलाम का गरीब होना आम बात है।

दूसरी तरफ एक एम्लायर ऐसे गुलामों का मालिक होता है और मालिक का अमीर होना भी एक आम बात है।

गरीब मजदूर हमेशा अमीरों के बनाए हुए ढाँचे में काम कर के उनको अमीर बनाते रहते हैं और क्योंकि अमीरों का काम पहले से ही कोई और कर रहा है इसलिए वे कम काम कर कर भी अच्छे पैसे कमाते हैं। Breakfast with Socrates

कार्ल मार्क्स ने दुनिया भर के मजदूरों को ये बातें समझाने की कोशिश की और उन्हें अपनी गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए उकसाया। आप अगर इन सभी बातों को अपने आप से जोडे़ं तो आप पाएंगे की आपके पास खोने के लिए सिर्फ आपकी बेड़ियाँ हैं।

अमीर बनने के लिए आपको ज्यादा मेहनत और कम आराम करना होगा। Breakfast with Socrates

कार्ल मार्क्स ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने लोगों को अमीरी या गरीबी के बारे में बताया। उनके बाद मैक्स वेबर नाम के एक समाजवादी ने लोगों को अमीर बनने का एक दूसरा रास्ता बताया।वेबर की मानें तो ज्यादा मेहनत और कम खर्च करना अच्छी आदत है जो हमें भगवान के करीबले आती है। भगवान के करीब आ जाने की वजह से सम्पत्ति भी हमारे पास आ जाती हैं।

दूसरी तरफ ज्यादा पैसे खर्च करना अच्छी आदत नहीं है क्योंकि वो हमें भगवान से दूर ले जाता है जिससे सम्पत्ति भी हमसे दूर चली जाती है। Breakfast with Socrates

वेबर के हिसाब से अगर आपको अमीर बनना है तो आपको ज्यादा से ज्यादा मेहनत करनी होगी और कम से कम आराम करना होगा। अपनी जरूरतों को कुर्बान कर के आप अमीर बन सकते हैं।

एक सरल और सीधी जिन्दगी ही हमें अमीर बनने के रास्ते पर लेकर जाएगी। दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो गरीब थे लेकिन उन्होंने ऊपर तक का रास्ता तय किया। वे ऐसा सिर्फ इसलिए कर पाए क्योंकि उन्होंने एक सरल जिन्दगी को अपनाया।

महिलाओं और पुरुषों के बीच के अंतर को खत्म कर के हम समाज में शांति ला सकते हैं। Breakfast with Socrates

हमारे समाज की ये भावना शुरूआत से रही है कि वो महिलाओं और पुरुषों को अलग नज़र से देखता है। ऐसा माना जाता रहा है कि पुरुष ताकतवर होते हैं और उनमें भावनाएं बहुत कम या नहीं होती। दूसरी तरफ ये माना जाता रहा है कि महिलाएं कमजोर होती हैं और उनमें बहुत सारी भावनाएं होती हैं।समाज की यही आदत आज एक समस्या बन गई है। अक्सर ही आपने लोगों को यह कहते हुए सुना होगा कि -:

लड़कियों को ज्यादा नहीं बोलना चाहिये।
या फिर आपने सुना होगा कि-:
लड़के रोते नहीं है।

फ्रान्स की महिलाओं ने इस समस्या से निपटने के लिए लोगों को सलाह दी कि वे इस भेद भाव को खत्म करें। लड़के और लड़कियां एक जैसे ही होते हैं। उनके शरीर में अंतर हो सकता है लेकिन अंदर से उनमें कोई अंतर नहीं होता।

अपने समाज को एक नया रूप देने के लिए आप भूल जाइए कि लड़के और लड़कियां या महिला और पुरुष नाम के कोई शब्द होते हैं। आप सिर्फ लोगों को इंसान के नाम से जानिए और ये सोचिए कि सब एक ही भगवान के बनाए हुए हैं । भेद भाव करना हमारी फितरत में है भगवान की नहीं।

अपने दुख से आजादी पाने के लिए आप ध्यान का सहारा लीजिए। Breakfast with Socrates

ध्यान का मतलब होता है अपने मन को इधर उधर की बातों में ना उलझा कर उस चीज़ पर फोकस करना जो इस समय आपके सामने है। ध्यान का मतलब है हमेशा प्रेजेन्ट में रहना और बीती बातों को छोड़कर आगे बढ़ना।

बुद्ध धर्म के हिसाब से ध्यान की मदद से आप अपने दिमाग की क्षमता के बढ़ा कत उसे हमेशा होश में और काबू में रख सकते हैं। कुछ लोग खुशी पाने के लिए उन चीज़ों के बारे में सोचते हैं जो उनके पास नहीं है लेकिन बुद्ध धर्म में हम सिर्फ़ उस चीज़ पर ध्यान लगाते हैं जो हमारे पास है। Breakfast with Socrates

हमारा सोचना ही हमारे दुखी होने का कारण है। हम अपने मन को उन चीज़ों या लोगों पर लगते हैं जो हमें प्यारे हैं पर हमारे पास नहीं है। यही ख्वाहिशें हमारे लिए दुख लेकर आती हैं और हमें उन चीज़ों पर ध्यान नहीं लगाने देती जो इस समय हमें खुशी दे सकती हैं।

आप अपने आप को इसपर में पूरी तरह से डुबो लीजिए। हर एक साँस के साथ अपनी धड़कन को महसूस कीजिए। अपने सामने रखी हुई चीजों को देखिए और उसके रंग ढंग में खो जाइए। ऐसा करने पर आप अपने मन को भटकने से रोक कर सुकून पा सकते हैं।

हम सभी इस दुनिया की यादों का एक हिस्सा हैं। Breakfast with Socrates

क्या आपने कभी सोचा है कि सपने क्यों और कहाँ से आते हैं? क्या आपने कभी सोचा है कि सो जाने के बाद आपके साथ क्या होता है? एक आम आदमी एक दिन में 6 घंटे सोता है। इस हिसाब से हम अपनी जिन्दगी का एक चौथाई भाग सोने में ही बिता देते हैं।

कार्ल जंग (Carl Jung) नाम के एक साइकोएनालिस्ट ने सपनों पर स्टडी की। वे सिग्मण्ड फ्रीउड के राइवल थे।

आइए देखें कि उनका का नींद और सपनों के बारे में क्या कहना है।

कार्ल जंग के हिसाब से जब हम सोते हैं तो हमारे साथ साथ सारी दुनिया सोती है।
उनकामानना था कि हम नींद में होश में नहीं होते और हमारे साथ ही ये दुनिया भी बेहोश होती है।। जब हम सपना देखते हैं तो हम सभी इस बेहोश दुनिया का एक हिस्सा होते हैं और एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। Breakfast with Socrates

हमारे सपने देखने पर ये सारी दुनिया सपने देखती है और इस समय हम सभी एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं। इस हिसाब से जब हम सोते हैं तो हम एक बहुत बड़े नेटवर्क का हिस्सा होते हैं और दुनिया की यादों और सपनों से जुड़े हुए होते हैं।इस प्रकार सपने हमें इस दुनिया से जोड़ने का काम करती है।

कुल मिला कर

फिलोसोफी की मदद से हम अपनी जिन्दगी के फैसलों को सोच समझ कर लेते हैं। इसमें हम अपने आप से छोटे बड़े सवाल पूछते हैं और उनका जवाब पाने की कोशिश करते हैं। दुनिया भर के फिलॅासफर्स ने हमें अपने आस पास की चीज़ों को समझने और उन पर सवाल करने के नए नए तरीके बताए जिनकी मदद से हम अपनी जिन्दगी से जुड़ी सभी चीजों के बारे में अच्छी जानकारी हासिल कर सकें।

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